बंदों में था दम
घाट का अवधूत..
इनसे जब पहला परिचय हुआ था तब हमें पता नहीं था कि यह भी
हमारे सहपाठी हैं।आवाज की बुलंदी,आकर्षक व्यक्तित्व और
भाषायी स्पष्टता पूरी क्लास पर अपना प्रभाव छोड़ रही थी।14 अगस्त को मुझे पता चला कि आर्य भारत नाम से ये फेसबुक पर काफी सक्रिय हैं और
मुक्त छंद में कविताएं भी लिखते हैं तब इन्हे पढ़ने की इच्छा जागी।फिर क्या था,इनका पूरा प्रोफाइल छान मारा।इतनी कम उम्र में इनकी कविताई की भाषा,उसकी उत्तेजना,उसका ओज और उसमें से आग उगलते प्रश्न देखकर मैं हैरान हुए बिना नहीं रह सका।
एक विद्रोही व्यक्तित्व जिसके पास अपनी हर दलील मनवाने के
लिए तर्कों और तथ्यों का भण्डार था,भाषा में
वियतनाम और क्यूबा के संघर्ष के इतिहास का यह अनोखा
प्रतिनिधि खुद को अफीम का बेटा कहने पर गर्व करता है,एक नक्सली का प्यार बनकर खुले विद्रोह की घोषणा करता है और मैं तुम्हारे पास आ
जाऊंगा साथी कहकर मित्रता और आत्मीयता का पवित्र आश्वासन देता है तो मेरे लिए यह
कहना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि न सिर्फ आर्य भारत का सहपाठी होना बल्कि उनके
समय का एक अदना साहित्य-सेवक भी होना मेरे लिए बड़े गर्व का विषय है।
अपना विपक्ष बर्दाश्त न कर पाना आर्य की बड़ी कमजोरी
है।इसके अलावा कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि विचारधाराओं की दो दिशाओं में से एक को
चुनने को लेकर उनके मस्तिष्क में भयंकर संघर्ष चल रहा हो।शानदार क्रांतिकारी कवि
के साथ-साथ आर्य भारत गजब के थिएटर कलाकार तो हैं लेकिन इन दोनों में से अपनी
उत्कृष्ट प्रतिभा की पहचान में कभी-कभी असमंजस में दिखाई पड़ते हैं।महत्वकांक्षाओं
से इन्हे अभी दूर रहना चाहिए और कर्मण्येवाधिकारस्ते के मंत्र पर काम करना चाहिए,ऐसा मेरा अपना मानना है।बाकी वह स्वयं एक निर्भीक कॉमरेड तो हैं ही और घाट के
अवधूत भी।
मैं आग दे रहा हूं मशालें जलाइए...
कभी-कभी निराशाओं और उदासी के सन्नाटों को ढांढस और आश्वासन
के तीर भी चीर नहीं पाते।भारी मन जब दिमाग पर बोझ लगने लगता था तब कदम अनायास ही
डॉ अनुराग अनुभव के आवास की ओर बढ़ जाते।एक जिंदादिल इंसान,एक बेहतरीन गीतकार और उन सबसे बढ़कर एक बेहतरीन दोस्त अनुराग का मेरी जिंदगी
से जुड़ना मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि है।हम सभी उन्हे मज़ाक में डॉ अश्लील बुलाते
हैं,लेकिन कभी भी उन्होने इस पर जरा सी भी नाराजगी दिखायी हो,याद नहीं आता।उनके हास्य-विनोद हर तरह की सीमाओं से मुक्त थे,लेकिन अंदाज ऐसा होता कि कुछ भी कह दें कोई बुरा नहीं मानता और अपनी हंसी तो
नहीं ही रोक पाता।
डॉ साहब का साथ होना मतलब मुसलसल बारिशों के बाद जैसे शाम
की खुश्बू,डॉ साहब की बातें जैसे सब दरशों का सार इनकी बातों में हों,डॉ अनुराग के अनुभवों ने ही तो बताया है कि इश्क़ के बाद कोई चाह कहाँ रहती है
या फिर ये मोहब्बत तो निगाहों से शुरु होती है।किसी कचनार सी आँखों से प्रेरित
होकर मोहब्बत के शानदार गीतों का रचयिता जब क्रांति की मशाल उठाता है और कहता है
कि मैं आग दे रहा हूँ मशालें उठाइए तो उसके शब्द और उसके अर्थ मानव-कल्याण और
विश्वशांति के प्रयासों और शुभाकांक्षाओं की गाथा के शीर्षक बन जाते हैं।
अब बोरे में भूसा भरने वाले भी
बोलेंगे
कम्प्यूटर साइंस से चार साल में बी.एससी. पास किया,वो भी दिल्ली विश्वविद्यालय से,तैयारी सीडीएस के माध्यम
से सेना में जाने की है और चले आए पत्रकारिता पढ़ने आईआईएमसी।अद्भुत व्यक्तित्व है
नीलेशवा।बहुमुखी प्रतिभा है उसमें।अच्छे खासे तनावपूर्ण और उदास माहौल को एक झटके
में तहस-नहस करने का टैलेंट भी है बंदे के पास।इसके कंप्यूटर साइंस पढ़ने का एक ही
फायदा हुआ और वो यह कि वो अब एक न्यूज वेबसाइट लोकल डिब्बा का मालिक है।लोकल
डिब्बा को गति प्रदान करने के उसके प्रयास हमें सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।
कक्षा के सभी असाइनमेंट हों या फिर परीक्षाओं की कॉपियाँ, पता नहीं किस जल्दी में सबसे पहले पूरा करके
सबमिट कर देता है कमबख़्त।लेख लिखने की अलग और ग़ज़ब शैली है नीलेश की।सरल भाषा,मजाहिया अंदाज और ज्ञानपरक तथ्य सब के सब एक ही लेखक की लेखनी से लिपिबद्ध होते हैं।धरती पर शायदे कौनों काम बचा हो जो नीलेशवा न कर पाए।सब में घुसा हुआ है।इसका आत्मविश्वास,किसी भी काम को करने की लगन,इसकी नियमितता और सबसे जरुरी इसकी सरलता मुझे बहुत गहरे प्रभावित करती है।
मेरे और इसके आपसी संबंध और परस्पर विनिमय होने वाले आचरण
कैसे हैं,उपर्युक्त आलेख की भाषा थोड़ा बहुत स्पष्ट कर ही रही होगी।ब्राह्मण महासंघ की
आईआईएमसी शाखा का अध्यक्ष है नीलेश,इसलिए लाख नोक-झोंक के
बावजूद कहीं कोई मुझ पर कोई अनावश्यक या आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहा हो तो उसकी
ऐसी-तैसी करने में सबसे आगे रहने वाला है।हमसे रोज मिलते ही पहले इसका काम मेरा
पैर छूना होता है फिर मेरे गाल पर थप्पड़ मारना,जैसे खुद के मेरे सामने झुकने की कीमत वसूल रहा हो।हालांकि उसके बाद पिटता भी
है मुझसे।
शुद्ध देहाती हरकतें कभी-कभी करते पाया जाता है।अपनी
क्षेत्रीय मौलिकता के साथ कोई छेड़छाड़ न करना इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।हर
मुद्दे पर अपनी राय जरुर रखता है लेकिन कभी बोलिए बहस श्रृंखला में नहीं
आया।किसीने पूछा कि नीलेश बोलिए में क्यों नहीं बोलता था तो मैनें भी कह दिया कि
अब बोरे में भूसा भरने वाले भी बोलिए में
बोलेंगे(हा हा हा हा,जस्ट जोकिंग)।
मातुलः पी के अभिव्यक्ति
नाम की सार्थकता मातुल के स्वभाव की सबसे बड़ी विशेषता है। 'मातुल'
आईआईएमसी ने उन्हें जीवन के इतने साल बाद एक नया नाम दिया
था। हिंदी दिवस के एक कार्यक्रम में आषाढ़ का एक दिन नाटक में निभाया गया मातुल का
उनका किरदार कब देखते देखते उनकी पहचान का प्रतिनिधि बन गया शायद उन्हें खुद भी न
पता चला हो। आज लगभग सब लोग उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं लेकिन कभी मातुल ने इस
संबोधन को अपने सही नाम से रिप्लेस करवाने की कोशिश भी नहीं की।
सरलता,गंभीरता और मस्तीपन इन
तीनों का कॉकटेल बड़ा दुर्लभ होता है। लेकिन प्रशांत इस कॉकटेल की दुर्लभ
प्रजातियों में से एक हैं। अनुराग भाई के साथ उनके मजाहिया वार्तालाप मेरे लिए
मनोरंजन का सबसे बेहतरीन विकल्प था। अनुराग का नाम डॉ अश्लील रखने में मातुल का
बहुत बड़ा योगदान है। मातुल जब भी आस पास कहीं होते हैं,माहौल हंसी ख़ुशी का बना रहता है। जीवंतता और सकारात्मकता इस व्यक्ति के अंदर
इस हद तक भरी पड़ी है कि क्या ही कहें! दिसम्बर में सेमेस्टर एग्जाम में मातुल के न
बैठने का जब फरमान जारी हुआ था,तब उन्हें दिलासा देने
हम उनके रूम पर गए कि निराशा की इस घड़ी में कुछ तो दिलासा दे दूं। वहां जाकर देखा
तो इनके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। इनका यही रूप तब भी देखने को मिला था जब
प्लेसमेंट के दौरान लगातार इंटरव्यू तक पहुँचने के बाद भी रिजेक्शन से जूझ रहे थे।
जिक्रे मोहब्बत – जिक्रे मेधाविनी
जिक्र ए जिंदगी जहाँ भी होगी,जिक्र ए मोहब्बत जहां भी होगा
जिक्र ए मेधाविनी उस महफिल की जरुरत बन जाएगी। सधी हुयी भाषा और प्रस्तुतिकरण का
रोचक अंदाज मेधाविनी की कविताओं और उनके हर लेखन को जीवंत कर देता है। फेसबुक पर
उनकी जिक्र ए जिंदगी-जिक्र ए मोहब्बत की 100 कड़ियों वाली सीरीज काफी लोकप्रिय हुई
थी।
मेधाविनी को मेरी शायद कुछ ज्यादा ही चिंता लगी रहती थी।
इसीलिए तो आज तक हम उनके मुताबिक अपना मुँह नहीं ठीक कर पाए। मेरे चेहरे पर खुशी
और रौनक की उसकी आशाओं का अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि कॉलेज के आखिरी दिनों
तक हम उनकी डाँट ही सुनते रहे कि कैसा सड़ा हुआ मुँह बना रखा है। कादंबिनी में
मेरी कविता छपने पर मेधाविनी बहुत खुश हुयी थी। और सिर्फ तभी नहीं जब जब मैं मंच
पर भी गया तब तब मेरी प्रस्तुति से उसका चेहरा खुशी से और खिला ही है। मेरी किताब
के बदले छाछ पिलाने का मेरा अधूरा वादा उस पर उधार है।
‘आप मार खाएंगे आज हमारे हाथ से’
ये आदमी पूरा छुपा रुस्तम था। चेहरे पर हमेशा एक मोहक
मुस्कान रहती थी। जब भी मिलता यही कहता आज आप मार खाएंगे, पूछा क्यों, तो आशीर्वाद
कौन देगा। धमकी देकर आशीर्वाद लेने वाला धरती की दुर्लभतम प्रजातियों में से एक है
शुभम। मुझे नहीं याद है, मुझे क्या किसी को नहीं याद होगा कि इसने कभी किसी को ‘तुम’ कहकर बुलाया होगा। यहां तक कि किसी
को गाली भी देता है तो ‘आप’ कहकर देता
है। अद्भुत है शुभम सोनकर।
हॉस्टल में ऐसा मानते हैं कि ‘मां’ के किरदार में था। जब भी कोई निराश
होता, दुखी होता, तो इसके पास चला आता। पता नहीं क्या जादू रहा होगा इसका। कुख्यात
रुम नं. 12 का बाशिंदा था। इसके दरवाजे हमेशा हर किसी के लिए खुले हुए थे।
व्यवहारकुशल तो था ही, लगभग हर काम में माहिर भी था। किसी भी काम को जितनी गंभीरता
से शुभम लेता था उतना शायद पूरे क्लास में कोई न लेता हो। उसके सारे असाइनमेंट
हमेशा सबसे पहले कंप्लीट रहते। उसमें हर चीज को जल्दी और बारीकी से सीख लेने की काबिलियत थी। बनारस हिंदू
विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक था। उसने अपने ब्लॉग पर कई लेख लिख रखे थे
लेकिन उन्हे कभी सोशल मीडिया पर शेयर नहीं किया। अपने काम के तारीफ की जैसे कोई
इच्छा ही न हो। एकदम वही व्यवहार, जिसे गीता में कहा गया है ‘दुखेषु अनुद्विगमनाः, सुखेषु विगतस्पृह’ जो कि मुनि
की एक परिभाषा भी है।
जल सा तरल व्यवहार, हर किसी के लिए मददगार। और उसके बारे में
लिख तो मैं रहा हूं लेकिन ये शब्द अलग- अलग लोगों के दिए हुए हैं। मेरा उससे केवल
मार खाने की धमकी सुनकर आशीर्वाद देने भर का रिश्ता था। मैनें उसे बहुत करीब से
कभी पढ़ा नहीं लेकिन सुना बहुत है। मुझे याद है वो दिन, जब जावेद की दुकान के
सामने हम थोड़ा सा अस्थिर मन से बैठे हुए थे कि अमन बरार के किसी मजाक पर उसकी
हंसी छूट गई थी। वह मजाक मुझे लेकर किया गया था, जिस पर हंसते हुए शुभम को हमने
तीन बार कठोर लहजे में कह दिया ‘इसमें हंसने वाली
क्या बात थी’। उसने ज्यादा कुछ नहीं कहा, हमारे हर कहन पर
सॉरी बोलता चला गया। गुस्से में होने के कारण मैंने महसूस नहीं किया कि उसे मेरा
लहजा बेकार भी लग सकता है। उस घटना के बाद से मैंने कई बार उसे ‘सॉरी’ बोलने की कोशिश की, लेकिन पता नहीं क्यों हो
नहीं पाया। अब तो शायद उसे याद भी न हो।
प्रधान संपादकः कृष्ण सर
कृष्ण सिंह सर हिंदी पत्रकारिता के विभागाध्यक्ष हेमंत जोशी
के बतौर सहयोगी काम करते थे। हम लोगों की संपादन और अनुवाद की कक्षाएं भी उन्ही की
देख रेख में होती थीं। एक शिक्षक होने के इतर कृष्ण सर का व्यवहार छात्रों के
प्रति इतना स्नेहिल था कि संस्थान से विदाई के वक्त सबके विरह दुख में कृष्ण सर
शामिल थे। कृष्ण सर बहुत बार याद आएंगे, मसलन जब किसी न्यूज वेबसाइट की खबरों का
अनुवाद करते वक्त हम गलतियां करेंगे तब अपने ऑफिस में इंडीविजुअली बुलाकर समझाते
हुए, जब ऑफिस लेट से पहुंचेंगे और बॉस की डांट पड़ेगी तब लेट से आने पर विनम्र
डांट डांटते हुए, बायो अटेंडेंस लगाते हुए भी कैंटीन तक अटेंडेंस सीट लेकर घूमते
हुए कृष्ण सर बहुत याद आएंगे।
किताबों के बीच का हमसफर
लाइब्रेरी सत्र के आखिरी दिनों में लगभग सुनसान पड़ी रहती
थी। इस सन्नाटे में हमारा एक ही साथी था जो लाइब्रेरी में घुसते ही एक अद्वितीय
मुस्कान के साथ हमारा स्वागत करता था। नाम था आश मोहम्मद। मुझे ये आज तक नहीं पता
है कि लाइब्रेरी में उनका ओहदा क्या है। लेकिन लाइब्रेरी से जुड़ी हमारी कोई भी
परेशानी उन्ही ने दूर किया है। वोल्गा से गंगा राहुल सांकृत्यायन की लिखी एक किताब
है जिसे हमने लाइब्रेरी से अक्टूबर में ईश्यू करवाया था और फरवरी में वापस किया।
नियम से देखें तो किताब के मूल मूल्य से ज्यादा तो उस पर फाइन हो गया था। आश
मोहम्मद के ही सहयोग से इतना फाइन भरने की नौबत नहीं आई। जब भी लाइब्रेरी गए दो
तीन दिन गुजर जाते तो अगले दिन जाने पर आस मोहम्मद पूछना नहीं भूलते बड़े दिन हो
गए, लाइब्रेरी आना कम कर दिया क्या।
एक बहुत ही विनम्र और बेहतरीन इंसान के तौर पर आश मोहम्मद
आजीवन हमारी यादों में रहेंगे। आपसे बिछड़ना भी कम दुखदायी नहीं है।
अद्वितीय मुस्कान वाले अन्नदाता
व्यक्ति ने जीवन भर कुछ न कमाया हो लेकिन उसने अगर बिना
शर्त लोगों की मोहब्बत कमाई हो तो समझ लेना चाहिए कि उससे अधिक धनवान धरती पर कोई
नहीं है। एक अखण्ड मुस्कान और अद्भुत तेज वाला वह गोरा चेहरा जो हर बार मिलने पर
थोड़ा और खिलकर मुस्कुरा उठता था जिसे हम लोग महिपाल जी कहकर बुलाते थे, उसने शायद
जिंदगी भर मोहब्बत के इस धन की बड़ी कमाई की है। संस्थान के कैंटीन के खाने में हर
दिन कुछ न कुछ कमी रहती ही थी लेकिन हर उस कमी को महिपालजी की मीठी बोली और उनकी
फूलों सी मुस्कुराहट पूरी कर देती थी। संस्थान में रहते हुए जब कुछ समझ न आए कि
क्या करें तब कदम अनायास कैंटीन की ओर बढ़ जाते थे। और कुछ नहीं तो महिपाल जी चाय
पिलाइए का जवाब हां राघवेंद्र चाय पी लो सुनने के लिए ही महिपाल जी से मिलने पहुंच
जाते। दिन भर की कितनी भी निराशा हो, जिंदगी की कितनी ही परेशानियां हों इनके
चेहरे की मुस्कुराहट जैसे हिमालय की तरह अटल, अखण्ड और अडिग है जिसकी गोद के किसी
शहर से महिपाल जी संबंध रखते हैं। जीवन के बढ़ते दौर में दुनिया के किसी कैंटीन
में चले जाएं महिपाल जी आज तो आप बड़े स्मार्ट लग रहे हैं कहने पर खिल जाने वाले
महिपाल जी हमेशा याद आते रहेंगे।
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