Wednesday, 7 June 2017

स्मृति जलधि तरंगाः 3 - लोग साथ आते गए..

लोग साथ आते गए..

ओरिएंटेशन से लेकर प्लेसमेंट तक, अनेक कहनियां हैं।
इन 9  महीनों के दरमियान एक अलग जिंदगी जी गई है। इस जिंदगी में सारे किरदार नए थे। फिर सभी किरदारों से मिलना हुआ, उन्हे पहचानना हुआ, उन्हें समझना हुआ। एक लंबी प्रक्रिया चली और ये नए किरदार जिंदगी के पुराने किरदारों से ज्यादा अहम होते गए। शुरुआत तो जरुर हुई थी अनुराग अनुभव से लेकिन नए किरदारों के जिंदगी से जुड़ने की यात्रा वाया प्राणेश, दया सागर, विवेक सासाराम, अभिषेक, पार्थ, नीलेश, गौरव से होते हुए पल्लवी तक पहुंच गई है। इस समुच्चय में कुछ किरदारों ने जिंदगी भर की स्मृतियों में स्थान बना लिया है। सभी का जिक्र करना बड़ा मुश्किल है। लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनका जिक्र करना हमारी मजबूरी है। क्योंकि इनके साथ होना मतलब खुद के साथ होना है। और जब खुद का इतिहास लेखन हो तो खुद के हर पहलू का लेखन जरुरी है। इसलिए इन लोगों का उल्लेख अपरिहार्य है।

कैसे हो बुरे से
ज़िंदगी कभी कभार आपको बिना मांगे ऐसा गिफ़्ट दे देती है जिसके लिए आपको लगता है कि आप उसके बिल्कुल लायक नहीं थे। जीवन का एक ऐसा दौर जब आपके आस-पास की भीड़ धीरे-धीरे खाली हो रही हो और आप अकेलेपन की ओर तेजी से विस्थापित हो रहे हों ऐसे में अगर कोई भी आपके कंधे पर हाथ रख ले तो शायद आप उसके ऋणी हो जाएं। शताक्षी मेरे जीवन के ऐसे ही एक दौर की साथी है। मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक जिसे मैं जीवन के आखिरी पड़ाव तक याद रखना चाहूंगा और यदि संभव हुआ तो उसके बाद भी। लेकिन खुद को मैं उसका ऋणी नहीं कहूंगा, क्योंकि इस दोस्ती में धन-ऋण का कोई कांसेप्ट नहीं है और यही इस दोस्ती की नींव है।


अपने कुछ विशेष दोस्तों को अपनी दृष्टि-परिक्षेत्र में समेटकर रखना उसके लिए दोस्ती की सिक्योरिटी का आश्वासन है। उसका बेस्ट फ्रेंड अगर किसी और से दोस्ती बढ़ाने की कोशिश कर रहा है तो उसका बेस्ट फ्रेंड उसका उतना अच्छा दोस्त नहीं है जितना कि वह किसी उसका दुश्मन। हृदय और व्यवहार हिमालय की श्रृंखलाओं से उतरती निर्मल गंगा की तरह पावन,निश्छल और शीतल है। किसी के भी दुख को अपने दिल में ऐसे उतार लेती है जैसे आकाश के आंसुओं को धरती अपने सरोवरों और सरिताओं में संजो लेती है। 

रुठने वाला सिस्टम बड़ा खतरनाक है इसमें। किसी बात पर अगर नाराज हो जाए तो फिर मनाना मुश्किल। और नाराज भी कैसी कैसी बात पर होती है, पीएसआर से सनराइज देखने के लिए नहीं रुके तो वो मुँह फुला कि रास्ते भर किसी से बात नहीं की। टेफलास जाने के लिए कोई साथ नहीं आया तो अखण्ड वार्ताबंद अभियान दो दिन तक चला। अपने दोस्तों का मजाक बनते देखना उसके लिए असह्य है। वह उस आदमी को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती जिसने उसके दोस्त से बद्तमीजी की हो। इसलिए उसके सामने हम लोगों के बारे में कोई कुछ ऐसा-वैसा बोलने से पहले एक दो बार सोच जरुर लेता था।

इन सबके इतर उसके पास चीजों को देखने-समझने की अद्भुत दृष्टि है और इसे मैं ईश्वरीय उपहार मानता हूं जो ईश्वर चुनिंदा लोगों को देता है। ब्रह्मपुत्रा हॉस्टल के सामने प्रमोद की दुकान पर या फिर यादव जी की दुकान पर मिलने वाली चाय हम लोगों के लिए बस एक चाय थी लेकिन उसके लिए भावनाओं के वे अक्षर थे जिस पर वो एक ब्लॉग लिख सकती थी। पुस्तकों और पुस्तकालयों से उसे कुछ दुश्मनी सी है लेकिन लेखनी तो जैसे उसके पूर्ण अधिकार में है। हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाओं पर उसका अधिकार कभी-कभी उससे ईर्ष्या करने को प्रेरित करता था। उसने कभी अपनी खूबियों का बखान नहीं किया जैसा कि नैसर्गिक खूबियां रखने वाले लोग अक्सर करते हैं। लेकिन उसकी प्रतिभा का विस्तार-क्षेत्र काफी बड़ा है। वो बहुत अच्छा गाती है, बहुत अच्छा लिखती है, बहुत अच्छा पढ़ती है और दोस्ती-रिश्ते-नाते सब कुछ बड़े ही परफेक्शनिस्ट अंदाज में निभाती है। खाने- पीने के शौक के बारे में क्या कहें। बस इतना समझ लीजिए कि इंसान को जैसे जिंदा रहने के लिए स्वच्छ हवा चाहिए वैसे इनको अच्छा खाना।

मेरी डायरी है अभिषेक
व्यक्ति आनंद में हो या दुख में,उसे एक ऐसे साथी की तलाश होती है जो उसके खुशी की कीमत को समझ सके और उसके दुख का भारीपन भी।दिल्ली आने से पहले मुझे एक ऐसे ही किसी जीवित अस्तित्व की तलाश थी जिसके सामने जाते ही मेरी हताशा का आधा भार स्वतः निरस्त हो जाए और जिसके सामने मैं अपनी छोटी-बड़ी सभी सफलताओं की पहली प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकूं।जिसे देख-सुनकर उसके चेहरे पर मेरे चेहरे से ज्यादा चमक दीप्त हो उठे।अभिषेक मेरी डायरी है,जिससे मैं कुछ भी नहीं छिपाता।सब कुछ बता देता हूं।शायद इसलिए कि वह मुझे पूरा सुनता है और धैर्य से सुनने के बाद अपने अंदाज में मुझे समझाता है कि अब क्या करना है।मेरी निराशाओं का सबसे ज्यादा भार अभिषेक के कंधों ने ही ढोया है।अभिषेक मेरे लिए उस बड़े भाई की तरह है जिसको मेरी हर सफलता खुद की सफलता लगती है।
 
राघवेंद्र,तुम बहुत प्यारे बच्चे हो।तुम्हारी कविताओं का एक स्तर होता है।तुम बहुत बड़े कवि बनोगे। ये सारी बातें मेरे लिए एक जिम्मेदारी,एक ख्वाब और एक उम्मीद की तरह हैं लेकिन अभिषेक के लिए यह एक अटूट विश्वास है। मेरी कविताई या मेरे लेखन पर मुझसे ज्यादा भरोसा उसे है।अभिषेक शीतल जल की तरह सरल व्यक्तित्व वाला है। क्लास में शायद ही किसी को उससे शिकायत होगी।संस्कृतनिष्ठ कविताएं लिखने वाला हिंदी का यह प्रतिभावान लेखक जब लोकल डिब्बा के अपने वेबसाइट पर सरलतम भाषा में लेख या न्यूज लिखता है तब पहचान करना मुश्किल हो जाता है कि उन कविताओं और इस लेख का लेखक एक ही है।लॉ का अच्छा जानकार है और मेरा होने वाला पर्सनल वकील भी।आईआईएमसी से मुझे डिप्लोमा नहीं अभिषेक मिला है और मुझे इसकी खुशी ज्यादा है।

अभिषेक से मैं पहली बार कब मिला था मुझे नहीं याद है। कब यह मेरा इतना खास बना यह भी नहीं याद। अच्छे दिनों और अच्छे लोगों की यही सबसे बेहतरीन खासियत होती है कि वो बिना किसी आहट के चुपचाप आते हैं और फिर जिंदगी में ऐसे रच- बस जाते हैं कि उनसे किसी भी कीमत पर जुदा होना संभव नहीं हो पाता। इस आदमी के रहते मुझे यहां कभी अपने किसी गार्जियन की जरुरत महसूस नहीं हुई। मेरी शकल देखकर बता देता था कि आज मेरी तबियत नहीं ठीक है या फिर मैं परेशान हूँ। उसकी इस कला से मैं हैरान था। अभिषेक से किसी भी तरह का बर्ताव करते वक्त मुझे किसी तरह का भय या फिर किसी तरह की आशंका नहीं होती थी कि कहीं मेरी बातों से, मेरे बर्ताव से उसे बुरा न लग जाए। दरअसल सच्चाई यही थी कि उसे कभी बुरा लगता ही नहीं था। या अगर लगता भी हो तो उसने कभी उसे प्रकट नहीं किया। मैं अपने किसी खास व्यक्ति से थोड़ी भी उपेक्षा महसूस करते ही दुखी हो जाता हूं। मुझे मेरी उपेक्षा बर्दाश्त नहीं होती है। और मुझे एक नहीं कई ऐसे मौके याद हैं जब मैनें अनजाने में उसकी उपेक्षा की है। लेकिन उसने उस बात का कभी बुरा नहीं माना। हां, उसने ये स्वीकार जरुर किया है कि उसे बुरा लगता था। अक्सर इस बात पर वह कह देता राघवेंद्र तुम मेरे छोटे भाई हो, तुम हमको छोड़कर कहां जाओगे। बस इसी बात का तो मैं मुरीद था।

जब मेरी कविता पहली बार कादंबिनी में छपी थी और ट्रेन में बैठे हुए मैनें उस पृष्ठ को पहली बार देखा था तब उस खुशी को साझा करने के लिए मेरे दिमाग में सिर्फ चार नाम आए थे, जिनको बताकर मैं उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहता था। उन चार नामों में से एक नाम अभिषेक का था और जिन दो लोगों को मैनें तुरंत वह फोटो भेजी थी रात के 11 बजे के आस पास, उनमें भी एक अभिषेक था।

बेइज्ज़ती का कोई पासबुक नहीं होता
एक अनावश्यक रुढ़िजन्य अनुशासन आपको खुले आकाश के बीचोबीच बांधे रखता है।जिससे आप जीवन के कुछ उन बेहतरीन पलों को जीने से चूक जाते हैं जो आपके कदमों के नीचे कुछ कर्णप्रिय अनावश्यक मधुर वक्तव्यों की सीमा के उस पार होती हैं और वक्त बीत जाने के बाद आपके पास उन पलों की स्मृतियों के न रहने का हवाला देने के लिए कुछेक अतार्किक और बेकार से दलीलों और 'अंगूर खट्टे थे' वाले पश्चात्ताप के अलावा कुछ भी शेष नहीं बचता।इससे पीछा छुड़ाने के लिए या तो आपके आस-पास कोई ऐसी प्रेरणा होनी चाहिए जो आपको तर्कों के उन शस्त्रों से नवाज सके जिसके बल पर आप रुढ़िता के उस बंधन को काटकर थोड़े स्वतंत्र हो सकें या फिर आपमें भयंकर साहस,असीम धैर्य और अखण्ड विद्रोह की प्रवृत्ति होनी चाहिए कि इन धारणाओं को तोड़ने के बाद प्रतिकार की प्रतिक्रियाओं का मुकाबला कर पाने की आपमें क्षमता हो।

सड़कों पर नुक्कड़ नाटक करने की हमारी बचपन की इच्छा थी।लेकिन हम न सिर्फ एक बेकार एक्टर थे बल्कि सड़क पर अभिनय करने को लेकर मन में बैठी एक संकोच की भावना ने सदा से ही मेरी इस इच्छा के फलीभूत होने का प्रतिरोध किया था।लेकिन यह मेरी खुशकिस्मती थी कि ऐसे समय में जब हमें सड़कों पर नुक्कड़ नाटक करने का अवसर मिला तब मेरे पास एक ऐसी प्रेरणा मौजूद थी जिसने मेरी इन दोनों बाधक धारणाओं को अपने तर्कों से चकनाचूर कर दिया।विवेक हमें न सिर्फ जीवन के कुछ छूटते खूबसूरत पलों को जीने के लिए प्रेरित करते थे बल्कि आस-पास की उन छोटी-बड़ी घटनाओं पर हमेशा विश्लेषणात्मक चर्चा भी करते थे जिनसे कुछ सीखा जा सकता है।

विवेक की वजह से बहुत सारी नई चीजें मेरी जिंदगी में जुड़ी,मसलन मैनें यहां आकर अच्छा बैडमिंटन खेलना सीख लिया,घटिया ही सही पंच मारने की कला सीख ली,दोस्ती निभाने के तमाम उसूल सीखे,कुछ सवालों का जवाब देने का ठेका वक्त को देना सीख लिया वगैरह वगैरह।विवेक ने ही हमे सिखाया है कि जब तक कोई रोके नहीं तब तक चलते रहो,क्योंकि बेइज्ज़ती को कोई पासबुक नहीं होता। वो बहुत ही सरल व्यक्तित्व के स्वामी हैं।भावनाओं और सोच के स्तर पर हममें काफी समानता भी है।राजनैतिक विचारधारा हम दोनों की दो ध्रुवों पर है,लेकिन यह हमारी दोस्ती में कभी हस्तक्षेप नहीं करती।अब सोचने में बड़ा अजीब लगता है कि कैंपस के शुरुआती दौर में विवेक के बोलने का हरियाणवी अंदाज मुझे उनसे दोस्ती करने को प्रेरित करता था,जबकि उनके पास इसके अतिरिक्त अनेक विशेषताएं हैं जो उनसे दोस्ती करने को मजबूर कर दें।

ऐ बे,सुन न, लव यू टू
कोई भी कठिन परिस्थिति कैसे आयी है,उसका पूरा मैकेनिक्स,उसका पूरा पोस्टमॉर्टम समझाने की जो कला समर के पास है,वो मैंने आज तक किसी में भी नहीं देखी।समर पर कोई सतही तौर पर दृष्टिपात करेगा तो वह उसकी उस छवि से ही परिचित हो पायेगा जो उसके असल व्यक्तित्व में 1 या 2 प्रतिशत हिस्सा भी नहीं रखती है। इंसान की खूबसूरती उसके दिल की खूबसूरती से ही निर्धारित होती है।और समर तो चेहरे से भी उतना ही खूबसूरत है जितना दिल से है।मेरे जीवन के सबसे कठिन दौर का खेवनहार है समर।दिल्ली के दिनों में जब जब मैं किसी परिस्थितिजन्य उलझनों के समर में अकेला हुआ,मुझे सुलझाने का ज़िम्मा उठाया समर ने।मैं कभी भी परेशान होकर समर के पास नहीं गया बल्कि 'क्या शुक्ला!सब ठीक है न!' कहते हुए सब कुछ भांपकर बिन मांगे समाधान दे जाने वाला समर मेरे जीवन का पहला ऐसा मित्र है जिसे मैं अपने 'सामाजिक विज्ञान,व्यवहारिकता के अलिखित शास्त्र' की शिक्षा देने वाला 'गुरु' भी मानता हूँ।समर केवल मेरे लिए ही अच्छा नहीं है,समर को जानने वाला हर शख़्स उसके विषय में यही धारणा रखता है।'ऐ बे!सुन न!' कहकर संस्थान में चल रहे हर समीकरण पर अपना अकाट्य और अखण्ड विश्लेषण देने वाला समर संघर्षों के अनुभवों की आग में तपकर विश्वसनीयता और महत्ता के खरे स्वर्ण जैसा बन गया है।

समस्या कोई भी हो, चर्चा किसी भी विषय पर हो हर मुद्दे पर जो मुखर है वही समर है। जल सी शीतलता और तरलता उसकी वाणी का श्रृंगार है। संस्थान के सर्वाधिक लोगों से उसकी बातचीत हाल चाल पूछने की सीमा से पार होगी ऐसा मेरा अनुमान नहीं विश्वास है। लोगों से बातें करना, अलग-अलग स्थान,पृष्ठभूमि से आए लोगों की संस्कृति उनकी परंपराओं पर उनसे देर तक बातें करना उसके सरल व्यक्तित्व का आभूषण हैं। दोस्ती और साथ निभाने का उसका अपना तरीका है। जिसको दोस्त मान लिया बस उसके लिए जान हाजिर। कभी-कभी यह मसला एकतरफा हो जाता है लेकिन फिर भी समर के समर्पण में कोई कमी नहीं आती। हद दर्जे का बुद्धिजीवी है। अगर कहें कि गुस्से में भी इसकी बुद्धि खुली रहती है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। बस कभी-कभी इसकी बातचीत के घोड़े बेलगाम हो जाते हैं नहीं तो इससे दूर जाने का और कोई कारण नहीं मिलता। आईआईएमसी में मानवरुप धरे इच्छाधारी डायमंड है समर।

लाख जवाबों से अच्छी मेरी खामोशी...
जीवटता का जीवित स्वरुप है अमनदीप सिंह बराड़।स्पष्ट बोलने वाला,छद्मता उसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है और झूठ बोलना उसे बिल्कुल नहीं आता।भावना के स्तर पर मेरे काफी करीब है। बच्चों की तरह मासूमियत पूरे कैंपस को मोहपाश में बांधे हुए है। हॉस्टल के रुम नंबर 12 में अक्सर पाया जाने वाला यह प्राणी हॉस्टल के रुम नंबर 13 में रहने वाले अक्षय के काफी करीब है और यही चीज मुझे अक्षय के प्रति ईर्ष्यालु बनाती है(जस्ट जोकिंग.हा हा हा)। हंसमुख व्यक्तित्व,सकारात्मकता का ज्योतिपुंज और 24 कैरेट खरा हृदय जो कभी किसी को अकेला या फिर उदास नहीं देख सकता।अमन मेरे लिए आईआईएमसी के उन पांच विशिष्ट लोगों में है जिन्हे मैं बिना शर्त मोहब्बत करता हूं,और जिन्हे मैं किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।जीवनभर।

मेरी कठिन कविता से इसे काफी दिक्कत है और मुझे पंजाबी गानों से।इसलिए जब कभी भी वो पंजाबी गाने बजाने की कोशिश करता तो उसे बंद कराने के लिए मैं उसे कविता सुनाने की धमकी देता।हर मिनट नोक-झोंक।दुष्ट पंजाबी मजाक में कभी-कभी हद पार कर जाता है और जब नाराज हो जाओ तो गले लगाकर ऐसे मनाता है कि फिर मानने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता।कनेक्शन्स वाले दिन की नाराजगी और उसके बाद अमन का गले लगकर सॉरी कहना मेरे जीवन के सबसे भावुक क्षणों में से एक है। दो बार हम इस तरह लड़ चुके हैं कि एक दूसरे बातचीत तक बंद हो गयी है। और दोनों बार सॉरी उसकी रही और गलती मेरी। और वैसे भी दोस्ती में अगर गलती करने वाला ही सॉरी बोले तो काहे की दोस्ती। कोल्डड्रिंक,पफकॉर्न और कुरकुरे इन तीनों से उसे इतनी मोहब्बत थी कि पूछो मत। इन चीजों के लिए यह आदमी आपको किसी भी महत्वपूर्ण यात्रा में रोक सकता है। इसका एक घिसा पिटा शेर था जिसको ये कहीं भी चेंप देता, कि लाख जवाबों से अच्छी मेरी खामोशी.. लेकिन खामोशी से इसका दूर दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।

जो भी हो,जैसा भी हो, है तो अपना बाई। ऐसा नहीं है कि सामने रहे तो इससे मेरी खूब बात होती है, हाँ नोंक-झोंक जरुर होती रहती है लेकिन जब भी यह पास होता है रौनक रहती है। इसके साथ पैदल बेर सराय वापस आना मेरे सबसे बेकार क्षणों में होता था।कारण था इसके कान में लग जाने वाला इयरफोन,जिसके बाद इसके बगल में बम फट जाए,इसे कोई फरक न पड़े। लेकिन इसके साथ बीते कुछ अच्छे पलों में इस दौरान का भी एक क्षण है जब अमन ने मुझमें आत्मविश्वास जगाने की कोशिश की थी। तब पहली बार लगा था कि जिसे हम बच्चों जैसा मासूम और नासमझ समझते हैं दरअसल वो हमसे कितना बड़ा और समझदार है।लोगों के पथ प्रदर्शक होते हैं,अमन मेरा दर्पण प्रदर्शक था।मुझे मेरी कमियाँ और मेरा आत्मबल दोनो दिखाने वाला दर्पण-प्रदर्शक।


लाल चश्मे वाला बुद्धिजीवी
रोहिन क्लास में सबसे अलग लड़का था।शुरु-शुरु की स्मृतियों की गली में जाता हूँ तो मुझे चश्मा लगाए क्लास के किसी बेंच पर बैठकर अकेले अंग्रेजी में लिखी कोई किताब पढ़ते रोहिन याद आता है।चलती क्लास में सबसे गंभीर और भारी-भरकम प्रतिप्रश्न(क्रॉस क्वेश्चन) अगर किसी का होता था तो वो रोहिन का होता था।अक्टूबर के आस-पास क्लास में डिबेट-संस्कृति का कोई वातावरण न पाकर हमने,शताक्षी ने और आशुतोष ने बोलिए नाम से एक बहस-श्रृंखला शुरु करने की योजना बनायी।किसी एक विषय की पूर्वसूचना देकर उस पर अगले दिन बहस करने की इस श्रृंखला से और कुछ मिला हो या न मिला हो हमें हर मुद्दे पर अपनी स्पष्ट व्यक्तिगत राय रखने वाला एक बुद्धिजीवी अवश्य मिल गया था(बुद्धिजीवी का संस्थान में एक और मतलब प्रचलित था,यहां उसका प्रयोग नहीं है)।

रोहिन के साथ रहने का मेरा अपना स्वार्थ था।मुझे किसी भी मुद्दे को,किसी भी मसले को समझने के लिए अनेक दृष्टिकोण मिल जाते थे। ठकुरसुहाती बोलना रोहिन की प्रकृति में नहीं है। चाहे इससे कोई नाराज होता हो या खुश होता हो। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है,जो मुझे भी बड़ी अच्छी लगती है। इसलिए मेरे किसी भी लेख या फिर किसी भी कविता पर रोहिन की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है। रोहिन जितना अच्छा दोस्त है उतना ही अच्छा प्रेरक भी है।

संस्पेंशन काण्ड के दौरान उसने जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला किया,स्वयं को सही सिद्ध करने में जिस तरह से उसने साहस का परिचय दिया वह अद्भुत था।रोहिन किसी भी अच्छे काम की जितनी खुलकर तारीफ करता है उतनी ही किसी भी गलत काम की खुलकर आलोचना भी करता है। स्पष्टवादिता,तथ्यपरकता,ज्ञान,ईमानदारी और सच को सच,गलत को गलत कहने का साहस,इन्ही सारी चीजों की बदौलत रोहिन ने भारत के सबसे बड़े मीडिया संस्थान के सबसे बड़े व्यक्तित्व के फैसले को चुनौती दे डाली थी।

हम बिहारी बानीं...
रीतिका क्लास में सबसे कम बोलने वाली लड़की थी। मास कॉम में ही उसने ग्रेजुएशन किया था और अपने कॉलेज की टॉपर यानी कि गोल्ड मेडलिस्ट रही थी। क्लास के अधिकांश असाइनमेंट्स के लिए जो ग्रुप बने थे उसमें मैं अक्सर उसी के ग्रुप में हुआ करता था। कोई भी काम करने को लेकर उसकी लगन देखकर मैं बड़ा हैरान था। 

उसके ग्रुप में रहने का फायदा ये था कि काम ज्यादा नहीं होता था क्योंकि ज्यादातर काम वह खुद ही कर लेती थी। हां, इसे हमारा निकम्मापन भी कह सकते हैं लेकिन उसके ग्रुप में रहने से चिंताएं कम रहती थीं, जो चीजें कठिन लगतीं उसे समझाकर सरल बना देती थी। हर काम उसे समय से पूरा करने की आदत थी और शायद इसीलिए वह गोल्ड मेडलिस्ट थी। जो चीज उसे सही लगती उसका समर्थन करने में उसे कोई हिचक नहीं थी और जो चीज उसे गलत लगती उसका विरोध करने में उसे किसी भी तरह का डर नहीं लगता था। मेरी कविताओं पर उसकी ओर से हमेशा सकारात्मक प्रतिक्रिया आती है जिससे हम काफी प्रेरित होते हैं। अपनी मूलता से उसे बहुत लगाव है। अपनी क्षेत्रीय पहचान,संस्कृति और भाषा सबको उसने अपने आप में संजोकर रखा हुआ है।

क्षेत्रीयता का मोह उसे कभी सीमित नहीं करता बल्कि उसे और व्यापक बनाता है, अलग- अलग तरह की विविधताओं को आत्मसात करने के लिए। उसके हृदय में मां तुल्य करुणा है। इसलिए वह किसी की भी पीड़ा को महसूस कर सकती है। किताबें पढ़ती है। और विविध विषयों पर अच्छी जानकारी रखती है।आजकल सोशल मीडिया पर उसके लगातार और बेहतरीन आलेख आ रहे हैं। हिंदी दिवस के दौरान साथ में एंकरिंग करने का दौर हो या फिर क्लास के वो छोटे- बड़े पल जब हम साथ होते थे, सब अविस्मरणीय रहेंगे।


नीलू की पल्लू, कभी हारना मत
ये आइआइएमसी का आखिरी गिफ्ट रही। मतलब कि अगस्त से लेकर अप्रैल तक जितने लोग भी आत्मीयता की परिधि में आए उसमें सबसे आखिर में इसका नंबर आया। इसके बारे में पहली बात कि बहुत बोलती है और लगातार बोलती है। दूसरी बात कि बेहतरीन लिखती है, कविता भी और लेख भी। शुरुआत में हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुआ करती थी। दोस्ती की दुनिया में बिना आहट के आने वालों में ये भी है क्योंकि इसके बारे में भी मुझे नहीं याद कि कब हमारी प्रगाढ़ता बढ़नी शुरु हुई। ये धरती पर एकमात्र प्राणी है जो मुझे शुक्ल बुलाती है। बाकी तो शुक्ला, शुक्ली, शुक्ले, शुक्ला जी और न जाने क्या क्या बुलाते हैं। हालांकि हर संबोधन का अपना जादू है, अपना स्नेह है।

पल्लवी के साथ मैंने ज्यादा समय नहीं बिताया है। एक दोस्त के तौर पर उसे मुझसे कुछ उम्मीद जरुर होती है। इसीलिए जब कभी वह निराश होती है तो अपने इमोशंस और अपनी परेशानियों को साझा करने में उसे कोई हिचक महसूस नहीं होती, और ऐसे वक्त में मैं अपनी निराशाएं भूल उसे प्रेरित और उत्साहित करने की कोशिश जरुर करता हूं। मुझे पता है कि यह मुझसे बेहतर तरीके से नहीं होता लेकिन प्रयास फिर भी करता हूं। हां, निराश भी तो बहुत जल्दी हो जाती है। इसे चाहिए कि हमेशा सकारात्मकता बनाए रखे खुद में। आत्मविश्वास तभी तो आएगा न।


मुझे याद है प्लेसमेंट के समय कैसे रेडियो में जाने के लिए उत्साहित थी। लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। किस्मत का क्या है आज नहीं तो कल साथ होगी ही। इंसान को उम्मीदों की उंगली थामे आत्मनिर्भर होकर बस चलते रहना चाहिए। किस्मत को जब इग्नोर करने लगोगे न, झक मारकर आएगी पीछे। पढ़ रही हो न इसको, तो रट लेना इसे। कभी हार मत मानना, कभी निराश मत होना। तुममें काबिलियत है, हिम्मत है और क्षमता भी कि तुम जो चाहो, वो तुम्हारा ही होगा। 


पार्थ स्वार्थी
ये लड़का भी अद्भुत था। बहुत बड़ा एक्टर था। इसकी हंसी-खुशी सबमें एक खतरनाक किस्म का अभिनय छिपा हुआ था। इसकी बनावटी हंसी काफी चर्चित थी। दिल्ली विश्वविद्यालय का इंग्लिश ऑनर्स का छात्र जब पत्रकारिता में विकल्प ढूंढता है तो हिंदी ही उसे आश्वस्त कर पाती है अच्छे भविष्य के लिए। विचारशील है, स्नेहिल है, प्यारा है। और अपना सबसे प्यारा भाई भी। भावुकता गले तक भरी हुई थी। दिल्ली छोड़ने की अधिसूचना मिलने के बाद कई दिनों तक उदास रहा, खुद को ही दिलासा देता रहा। नए दोस्त बनाने का शौकीन था, इस चक्कर में अक्सर पुराने छूट जाते थे।



अक्सर उदास पाया जाता था, कारण पूछने पर बहाने बना लेता। इसका रहस्य आज तक नहीं जान पाया हूं। कोई प्रोग्राम हो तो इसके रुम में पहुंच भर जाओ फिर तो वहां से पूर स्वरुप बदल जाता था। शुक्ली कुर्ता पहन ले, जूता निकाल, ये पहन, इस पर ज्यादा अच्छा लगेगा। तुम्हारी इस आदत पर तब तो बड़ा प्यार आता था, अब उसको याद कर करके आंखें ही गीली होती हैं। उस दिन हल्का सा बुखार महसूस हो रहा था, इसने सुन लिया। हास्टल रुम में जाकर दवा लाया, जबर्दस्ती खिलाया। जबर्दस्ती इसलिए कि मैं हल्के-फुल्के बुखार में दवा खाने का आदती नहीं हूं। लेकिन उस दिन इसकी वजह से खाना पड़ा। वैसे, है बड़ा स्वार्थी और कंजूस। एक समोसा खिलाने में जान निकल जाती है इसकी। चाव-वाय तो सोचो भी मत। मुझे इसके गाल पर बिना मतलब थप्पड़ लगाने में बड़ा मजा आता था, एक दो बार तो इसके किसी खास के सामने भी गलती से थप्पड़ लगा दिया था। हां, बाद में सॉरी बोल दिए, लेकिन ये सॉरी गलत जगह पर पीटने के लिए थी, पीटने के लिए नहीं।


आतंक का दूसरा नाम खुशबू भाई
आतंक का दूसरा नाम यहां बाबू भाई नहीं था, यहां आतंक का दूसरा नाम था खुशबू भाई। इसकी हरकतों के बारे में शायद सबको पहले से पता था, इसीलिए तो सीआर के चुनाव में कोई इसके विरुद्ध खड़ा तक नहीं हुआ। पूरे आईआईएमसी में मेरा एक ही तो भाई है जिसकी बदौलत हम बेखौंफ घूमते हैं। किसी की हिम्मत नहीं कि कुछ बोल दे हमको, क्योंकि उसके बाद उसकी खैर नहीं। खुशबू भाई के जबर्दस्त मुक्कों के आगे पाकिस्तानी तोपों के गोले भी पानी के बुलबुले लगते हैं। अगर आपको लगता है कि मैं ऐसे कई मुक्कों को खाने के बाद ही ऐसा लिख पा रहा हूं तो आप गलत नहीं सोच रहे, हम पर भी कई बार आक्रमण हुआ है, लेकिन बहन होने के नाते थोड़ी बहुत रियायत मिलती ही थी। औरों के मुकाबले मेरे नसीब में वो मुक्के और थप्पड़ कम ही आए थे।


इस आपदा से सर्वाधिक पीड़ित थे हमारे दूसरे सीआर विवेक कुमार। बाकी थोड़ा कम थोड़ा ज्यादा, लगभग सभी लोग इस बमबारी की चपेट में आए ही थे। घोर महिलावादी है। इसीलिए हम उसको अगर भाई कहते हैं तो उसको कोई परेशानी नहीं है और बदले में वो मुझे बहन बोलती है तो मुझे भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, शायद मुझे कोई परेशानी है भी नहीं। दरअसल ये किस्सा शुरु हुआ था जब खुशबू की बुलंद आवाज और वजनी मुक्कों वाली प्रवृत्ति से प्रेरित होकर डॉ अनुराग अनुभव नें उसे नाम दिया खुशबू भाई का जिसके प्रत्युत्तर में उसने हम दोनों को बहन बुलाना शुरु किया। कालांतर में अनुराग भाई के आपत्ति जताने पर उसने उन्हें बहन बुलाना बंद कर दिया और मेरी ओर से कोई मजबूत आपत्ति थी नहीं सो मैं उसका बहन बन गया। मेरा तो सीधा सा मंत्र है, प्रेम चाहे जिस रुप में आए स्वीकार करना चाहिए। वैसे खुशबू का प्रेम क्लास में दो और लोगों पर कुछ ज्यादा ही था, नाम नहीं बताएंगे... कि बता दें खुश्बू! (ही ही ही )

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