भूमिका
सवाल ये है कि इस साल की इतनी खासियत क्यों हैं। यादें तो
और भी होंगी जीवन में। इसे लिपिबद्ध करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, इसे संजोने की
आवश्यकता क्यों पड़ी। तो वक्त ने जीवन के कई सालों को अपने आप में समाहित किया है
लेकिन ये साल खास था क्योंकि इस साल का जो हाथ मैनें थामा था मैं उसे छोड़ना नहीं
चाहता था। इस साल मैनें न जानें कितनी जंजीरें तोड़ी हैं। इस साल मैंने न जाने
कितने पंख खुद में जोड़े हैं। इस साल ने जीवन के कई असली रंगों का थोड़ा- थोड़ा ही
सही लेकिन परिचय करवाया है। इस साल ने न जाने जिंदगी जीने की कितनी तरकीबें दी
हैं, कितने कारण दिए हैं। इस साल स्वप्नों ने अपना स्तर संवारा है, मतलब कि मेरे
ख्वाब अब न आकाश में हैं और न रसातल में। मेरे ख्वाब अब जमीन पर हैं। इस साल ने
मुझे मेरी अहमियत का अहसास कराया है। इस साल ने मुझे वो जिम्मेदारियां थमाई हैं जो
मैं अपना समझता ही नहीं था लेकिन वो मेरी ही थीं। इस साल ने जिंदगी के जंगल में
मुझे रास्ता दिया है। मुझे सपने दिए हैं, आशाएं दी हैं, विश्वास दिया है।
स्मृति के इस अद्भुत शास्त्र का लेखन केवल स्मृति के आधार
पर किया गया है। हो सकता है मेरी कमजोर स्मरण शक्ति इस साल के कई खूबसूरत पलों को
संजोकर न रख पाई हो इसलिए उसका जिक्र भी न हो पाया हो, इसलिए इस स्मृति संग्रह के
विस्तार का कार्यक्रम तब तक बंद नहीं होगा जब तक कि सारी स्मृतियां इस कोश में
दर्ज न हो जाएं। फिलहाल के लिए जो है, यही है। कई दिनों की लगातार कोशिशों के बाद
इसका यह स्वरुप तैयार हो पाया है। लगातार समय की कमी और अन्य कामों में व्यस्तता
के चलते कई बार इसका काम रोकना पड़ा लेकिन एक धुन थी कि जब भी पूरा हो, इसे पूरा
करना ही है। अभी इसमें बहुत सारी चीजें जोड़नी हैं, इसलिए यह पुस्तक का अंतिम
स्वरुप नहीं है।
शुक्रिया
राघवेंद्र शुक्ल

No comments:
Post a Comment