Friday, 9 June 2017

स्मृति जलधि तरंगाः 8

आईआईएमसी आना पता नहीं किस्मत थी या मेहनत। लेकिन यहां आने के साल भर पहले की बात करें तो आईआईएमसी का नाम तक नहीं जानते थे। विज्ञान के विद्यार्थी थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज में तीन साल जिस जद्दोजहद के साथ बीएससी कंपलीट किया था उसने साइंस में पढ़ाई आगे जारी रखने की मंशा की कमर तोड़कर रख दी थी। कुछ नयी शुरुआत करनी थी। पत्रकारिता ने इसलिए भी अपनी ओर खींचा था क्योंकि लिखने और पढ़ने की अपनी आदत और अपने शौक से हम आजीवन जुड़े रहना चाहते थे। केशव सरस्वती उच्चतर माध्यमिक विद्या मंदिर रुद्रपुर में पढ़ाई करते वक्त उस स्कूल की छात्र संसद का एक बार सूचना प्रसारण मंत्री रह चुके थे, जिसका काम था प्रतिदिन की प्रार्थना सभा में समाचार वाचन करना। पत्रकार बनने की इच्छा ने तो तभी मन में जन्म ले लिया था। लेकिन जिस पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से हम आते हैं वहां इस तरह के सपने देखे तो जा सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने का ख्याल भी अपने दिमाग से निकाल देना होता है। वहां सीख देने वाले ज्यादातर हितैषी आपको आईआईटी, पॉलीटेक्नीक, य़ूपीटीयू की तैयारी करके जल्द से जल्द अच्छा मेकैनिक बनने का सुझाव तक ही दे पाते हैं।

खैर, अजय भाई जो कि आईआईएमसी 2015-16 बैच के छात्र भी रहे हैं, उन्हीं की प्रेरणा और कोशिशों की बदौलत आईआईएमसी में आना हुआ। आईआईएमसी पहुंचे हुए उन बहुत कम लोगों में मैं शामिल था जिन्हें इस इंट्रेंस एग्जाम को पास कर लेने की कोई खुशी नहीं थी। मेरा खुश न होने का कारण था कि इस इंट्रेंस को पार करने के बाद भी मैं वहां जा नहीं सकता। मेरे अभिभावकों को मेरा साइंस की पढ़ाई छोड़ पत्रकारिता करना पसंद नहीं था। लेकिन जहां चाह, वहां राह। बड़े भाई परमानंद शुक्ला की सहायता से जिंदगी के इस बड़े मोड़ को स्वीकार करने का अवसर मिल ही गया।

अब चूंकि मुझे आईआईएमसी के इतिहास के विषय में ज्यादा कुछ पता नहीं था इसलिए मैं इसका आंकलन नहीं कर पा रहा था कि यहां जो कुछ भी हो रहा है, या जो कुछ भी पढ़ाया जा रहा है वह कितना सही है, कितना गलत। पत्रकारिता का क ख ग नहीं जानने के कारण शुरुआत में मुझे यहां कुछ भी समझ नहीं आया। क्लासेज रेग्यूलर चल रही थीं, टीचर्स शायद अपना शत प्रतिशत दे रहे थे। लेकिन क्लास में कई ऐसे विद्यार्थी थे जो आईआईएमसी के इस रवैय्ये से नाखुश थे। अब चूंकि मेरे पास कोई दृढ़ आधार नहीं था, इसलिए मैं इसकी विवेचना नहीं कर सकता था। शुरुआती दौर में डीजी सर का क्लास में आना, एडीजी सर का क्लास लेना, सबकुछ प्रभावित कर रहा था। तमाम कार्यक्रम खासकर हर शुक्रवार होने वाला सेमिनार, कक्षाएं, प्रायोगिक कक्षाएं, पुस्तकालय शानदार कैंपस वातावरण सब कुछ एक अच्छी अनुभूति की तरह थी। सहपाठी भी चूंकि चुने हुए लोग थे, इसलिए सब के सब प्रतिभाशाली और व्यवहारिक थे।

पत्रकारिता के एक बड़े संस्थान की जो छवि मेरे दिमाग में थी, वह पूरी तरह से आईआईएमसी से नहीं मिलती थी। एक विमर्श और बहस का जो मंच इस संस्थान में होना चाहिए था, जिससे पत्रकारीय कौशल के साथ साथ पत्रकारीय आदर्श और सिद्धांत भी छात्रों में विकसित हो सकते थे, वो यहां नदारद था। साहित्यिक संगोष्ठियों की पूर्ण अनदेखी की गई थी। क्लास के अधिकांश छात्रों में एक स्वस्थ बहस में शामिल होने की न तो क्षमता थी और न योग्यता। अधिकांश नें विचारधाराओं के झण्डे पकड़े हुए थे। जिसके विचार किसी धारा का हाथ थामें हुए होंगे उनकी कलम पत्रकारिता के उबड़-खाबड़ रास्तों का सफर कैसे तय कर पाएगी। वो तो वहीं जाएंगे जहां उन्हें वो धारा लेकर जाएगी, और ऐसे में तो पत्रकारिता को पीछे छूटना ही है। कुछ बोलने के लिए सुनना भी बहुत जरुरी है। कुछ लिखने के लिए पढ़ना भी बहुत जरुरी है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, एक दूसरे के बिना चल नहीं पाएंगे। यहां बहुत से लोगों नें दोनों को अलग अलग चलाने की कोशिश की है। पूर्वाग्रह और अनुचित धारणाओं नें कई लोगों के बीच व्यक्तिगत दरार पैदा कर दिया था। विचारों की लड़ाई विचारों से होनी चाहिए थी, उन लड़ाइयों के बीच व्यक्तिगत संबंधों को वैसे ही सहेजकर रखना चाहिए जैसे दांतों के बीच जीभ। बहस का मैदान और कुरुक्षेत्र दोनों को अलग रखना पड़ेगा, यही सही है। यही कारण रहा कि कॉलेज के आखिरी दिन कई लोगों के संबोधन बहुत तीखे और आहत करने वाले रहे। हमें किनसे मोहब्बत है, ये हम बताएं या न बताएं लेकिन हम किनसे नफरत करते हैं इसका ढिंढोरा पीटना मैं जरुरी नहीं समझता। इससे तनाव बढ़ता है, समाज में आनंद का तारतम्य बिगड़ता है, और वैसे भी जीवन में अनेकानेक दुख हैं, क्यों अपनी ओर से उसमें कुछ जोड़ना है।

आखिरी दिन के संबोधन में मुझे किन किन लोगों ने प्रभावित किया था, मुझे कौन लोग अच्छे लगे मैं उन लोगों का नाम लेने वाला था वहां, लेकिन उन नामों में मैं एक नाम शामिल नहीं कर सकता था क्योंकि उन दिनों उस नाम से मेरे संबंध कुछ ठीक नहीं चल रहे थे, इसलिए मैनें किसी का नाम नहीं लिया। यह बात मुझे आज तक कचोटती है। आखिर एक छोटी सी गलतफहमी की वजह से मैं उन लोगों को उनके नाम लेकर संबोधित और आभार ज्ञापित नहीं कर पाया जिन लोगों की वजह से मेरा पूरा साल जीवन का सबसे बेहतरीन साल रहा है।

बीतते समय के साथ संस्थान  की दीवारो के भी रंग बदलते रहे। कई घटनाओं ने आहत किया। एक पत्रकारीय संस्थान में ऐसी गतिविधियों की आशा नहीं थी। पत्रकारिता को लेकर जो नरम आशाएं मन में थी, चटक कर टूटने लगीं। शिक्षकों ने साल भर वही किया जो उन्हें करना था। क्लास में एथिक्स और चेंज पढ़ाने सीखाने वाले लोगों नें उसके प्रैक्टिकल के दौरान अपने दरवाजे बंद कर लिए और ऐसा करके भी उन्होंने कुछ नई सीख हमारे कोश में जोड़ दिया। कुछ लोगों का साथ वास्तव में अविस्मरणीय रहा। वही आईआईएमसी की उपलब्धि कहे जा सकते हैं। बाकी एक साल का अंत उम्मीदों का अंत नहीं है। हर जगहों पर बुरा ही हो रहा होगा, यह भी तो संभव नहीं है। और हमारे लिए कुछ करने का अगर अवसर चाहिए तो हर जगह सही भी तो नहीं होगा। कुछ सही होगा, कुछ बदलेगा और कुछ हमें बदलना होगा। इसी आशा और विश्वास के साथ इस साल के सभी साथियों को जीवन का एक वर्ष खुशनुमा बनाने के लिए बहुत शुक्रिया और आने वाले लोगों को बहुत सारी शुभकामननाएं।

प्रणाम!

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