Wednesday, 7 June 2017

स्मृति जलधि तरंगाः 1 - आरंभ

स्मृति जलधि तरंगा


हर शै की एक आखिरी सीमा होती है। हर समुंदर का एक आखिरी किनारा होता है। हर दौर की एक आखिरी तारीख होती है। 31 मई 2017 एक ऐसी ही तारीख है। जिसके अगले पड़ाव पर है संभावनाओं और अवसरों का एक कुरुक्षेत्र जहां जिंदगी की जद्दोजहद की लड़ाई लड़ने के लिए आपके पास हौसलों के गांडीव और आशाओं के तीर के अलावा कुछ भी नहीं है। यहां दो रास्ते हैं, या तो जीवन में होने वाले एक बड़े परिवर्तन का स्वागत कीजिए या फिर बदलाव और नई जिम्मेदारियों को अस्वीकार करते हुए पीछे लौट जाइए। युगों-सदियों के एक बड़े आकाश में कुछ दशकों का हिस्सा आपके कोश में होता है। मतलब कि एक छोटी सी आयु या फिर अवसर कहें तो ज्यादा बेहतर हो, आपको अपने जीवन का विस्तार करने का मौका देती है। हर सफल व्यक्ति का जीवन मेहनत की नाव का मल्लाह होता ही है। संघर्ष तो अपरिहार्य है ही सबके लिए। लेकिन संघर्षों-विघ्नों-बाधाओं से भरे इस जीवन यात्रा में प्रकृति आपको एक बार ऐसा मोड़ प्रदान करती है जिससे आपके जीवन की दशा और दिशा बदल सकती है। हमें इस मोड़ को पहचानना होता है। आईआईएमसी आना शायद मेरी जिंदगी का ऐसा ही एक मोड़ है।

31 मई उस पुस्तक का आखरी पृष्ठ है जिसका पहला चैप्टर शुरु होता है 1 अगस्त 2017 से। मैं अपने गांव में हूं। आज के दिन वैसे मुझे होना चाहिए था महात्मा गांधी मंच नाम के उस आडिटोरियम में जहां पत्रकारिता की विद्या पढ़ने के लिए आए संस्थान के नए सत्र के विद्यार्थियों का स्वागत-कार्यक्रम चल रहा था। लेकिन मैं था गोरखपुर जिले के एक गांव रकहट में, जहां एक इंटरमीडिएट स्कूल में कक्षाएं चल रही थीं और मैं बच्चों को गणित और भौतिकी के दांव-पेंच सीखा रहा था। अभी  5 दिन पहले ही दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान में एडमिशन लेकर आया हूँ। सोचा कि अभी कक्षाएं शुरु कहां हुई होंगी। दो चार दिन बाद से जाएंगे तो भी कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसा लग जरुर रहा होगा कि मुझमें लापरवाही की हद है। उधर संस्थान का सत्र शुरु हो गया है और हम अभी दो चार दिन और गांव में आराम फरमाने के चक्कर में हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। इसके पीछे एक लंबी पृष्ठभूमि वाली कहानी है। जिसकी चर्चा बाद में करेंगे।  

बीस साल के हो गए थे हम। और बीसवें साल का पल-पल एक ही गीत गा रहा था..

 
4 अगस्त को गोरखधाम एक्सप्रेस की स्लीपर कोच में एक ऐसे आकाश में उड़ने के लिए उड़ान भर रहे थे जिसके बारे में कभी ठीक से सोचा नहीं था, कभी उसके ख्वाब नहीं देखे थे, कभी उसके लिए भगवान से प्रार्थना नहीं की थी। लेकिन हां, जिसके लिए यह सब किया था, यानी कि सपने देखे थे, प्रार्थनाएं की थीं उसका रास्ता इसी आकाश से होकर जाता है। अनुज शर्मा, मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक, गोरखपुर से दिल्ली के रण में उतरने से पहले मुझे विदाई का तिलक लगाने के लिए हमारे साथ थे। आज हमारी आधिकारिक जन्मतिथि भी थी मतलब मार्कशीट वाली। बीस साल के हो गए थे हम। और बीसवें साल का पल-पल एक ही गीत गा रहा था-
"सपने टूटे नहीं अभी तक।
संकल्प नए ,अविकल्प भये।
सुविधा के दिन हो अल्प गए।
मिल जाये जब तक राह नहीं।
छाया तक की भी चाह नहीं।
साँसों ने सानी माँगा है।      
इक नई कहानी माँगा है।
मंजिल की आखिर प्यास बुझे,
जीवन ने पानी माँगा है।
होगा प्रहार,धरती से मृदु-
जलधारा फूटे नहीं जभी तक।
सपनें टूटे नहीं अभी तक।"

5 अगस्त को ओरिएंटेशन के दूसरे सत्र में मेरी उपस्थिति हुई। रातभर ट्रेन में सफर की थकान सुबह नए सफर की यात्रा के उत्साह के आगे काफूर थी। अनुराग अनुभव से मुलाकात हुई। सारी जानकारी मिली कि पिछले चार दिनों से यहां क्या हो रहा था।

8 अगस्त से कक्षाओं का दौर शुरु हुआ। हम वहां पहुंचे जहां से लोकतंत्र के चौथे खंभे की इंट बनने के लिए तैयार होना था। उस कक्षा में जिसकी बेंचों पर न जाने कितने कलमदारों ने कलम की ताकत को आत्मसात किया था। गौरवपूर्ण अनुभूति। साथ में एक अनेकानेक संशय थे। आवास की स्थायी व्यवस्था, संस्थान में स्नातक आखरी वर्ष का अंकपत्र सबमिट करने की चिंता जो सबसे ज्यादा आतंकित करने वाली इसलिए भी थी क्योंकि फीजिक्स के दो पेपर्स में बैक लगने के बाद द्वितीय परीक्षा देने की अनिवार्यता थी जिसमें फेल हो जाने की भी संभावना थी। ऐसा होने पर आईआईएमसी में पढ़ने का यह सपना अकाल दम तोड़ देता। लेकिन न जाने मेरे प्रारब्ध में कैसे पंख लगे हुए थे कि आईआईएमसी पहुंचने तक मिली अनेक बाधाओं की तरह ये बाधा भी बड़े आराम से टल गई। अब मैं आईएमसी का था और आईएमसी मेरा।

अगस्त 2016ः हिंदी पत्रकारिता की कक्षा


आईआईएमसी से इतने लगाव की कभी उम्मीद नहीं थी। शायद किसीसे इतने लगाव की उम्मीद नहीं थी। एक स्वर्णिम दौर जो इतने कम समय में ही न जाने कितने खट्टे-मीठे अनुभवों का कोश बन गया। कहते हैं न, चांदनी भी चार दिन की होती है, बसंत भी कुछ ही दिनों का होता है। शायद सृष्टि के उसी सिद्धांत का प्रायोगिक प्रदर्शन था जीवन का यह दौर। महज 8 महीनों में इतनी यादें कि सबका विवरण लिखना बहुत मुश्किल है। कुछ दोस्त, कुछ लोग, कुछ जगहें और कुछ चीजें जो दिल में बस गए, जो स्मृतियों की शिलाओं के लेख बन गए, उनको कुछ पंक्तियों में क्या वर्णित कर पाएंगे। लेकिन एक कोशिश है , एक जिद है कि जैसा हो पाए, जितना हो पाए, जैसे हो पाए इस इतिहास का लेखन तो करना ही है। अभी फिलहाल के लिए एक छोटा सा प्रयास  है जिसके विस्तार का वादा है आपसे भी और खुद मुझसे भी।

विश्व के अनेक लोगों की अनेक कहानियां होती हैं। फिर उन कहानियों में अलग अलग तरह की  कहानियों का अलग अलग वर्ग बन जाता है। जिन कहानियों का कोई वर्ग नहीं होता यानी कि जो कहानियां सबसे अलग होती हैं, वो लिखी जाती हैं। मेरी कहानी इस दुनिया में ऐसी कहानी नहीं है जो सबसे अलग है। लेकिन राघवेंद्र शुक्ला होते हुए मेरी अपनी एक अलग छोटी सी दुनिया है। यह दुनिया मुझे तब नजर आती है जब मैं अपने आपको सृष्टि के एक अवयव के रुप में सोचता हूं। बड़ी छोटी है यह दुनिया। शायद इससे किसी और की दुनिया को कोई फर्क न पड़ता हो, लेकिन मेरी दुनिया के हर बदलाव से मुझे तो फर्क पड़ता ही है। मेरी इसी दुनिया की यह कहानी है। मैं खुद के लिए लिख रहा हूं ताकि आज से कई सालों बाद जब इस वक्त के घटनाक्रमों की जीवन में कभी पुनरावृति हो तो यह कहानी कुछ सिखा सके। इस कहानी के कई हिस्से हैं, इसकी कई परते हैं, इससे कई सारी चीजें जुड़ी हुई हैं। सबके बारे – बारे में कुछ न कुछ कहने की कोशिश करुंगा, जितना भी मेरी स्मृति में होगा।

यादें बर्फ की तरह होती हैं। वक्त के साथ पिघलती रहती हैं। लेकिन जब तक सख्त रहती हैं तब तक दिमाग को जकड़े रहती हैं। पूरा साल कब निकल गया किसी को पता नहीं चला। ये कहानी लिखना हमनें तबसे शुरु कर दिया था जब हम उस कैंपस में थे जिससे अलग होने के बाद इसे और बढ़ाने की जरुरत महसूस हुई। ये साल भर के जीवन की उठा-पठक का भाष्य है। यह स्मृतियों के उस तरंग का गीत है जो वर्ष भर के समंदर में उठती गिरती रहीं।  

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