24 घंटों का शहर, बेर सराय
बेर सराय दिल्ली में मेरे अपने निवास स्थान के परिचायक के
तौर पर बताया जाने वाला एक ऐसा मोहल्ला था,जिससे प्रायः मेरी
मुलाकात हर रोज़ रात 9 बजे के बाद ही होती थी।सुबह तैयार होकर तकरीबन 10 बजे के आसपास जब इस अस्थायी आशियाने को छोड़ते थे,तबसे दिनभर (मतलब दोपहर से शाम तलक) यहां के मौसम के मिज़ाज़ के बारे में मुझे
कोई भी जानकारी नहीं होती थी।दिनचर्या के आखिरी हिस्से यानि कि लगभग रात 10 बजे के आस पास में फिर से बेर सराय का नाम लिखा होता था।मेरे हिस्से के
वातावरण में चेतना के 3 या 4 घण्टे और नींद के 6 या 7 घण्टे,कुल मिलाकर 9 या 10 घण्टे बेर सराय की हवाओं का हिस्सा थे।
बेर सराय के एक छोटे से चौराहे पर जीतू की चाय की दूकान
है।रात-बिरात,
दिन-दोपहरी जब भी चाय की तलब लगे,जीतू याद आ जाता था,और हम पहुँच जाते वहां चाय-पान करने।जीतू की दूकान के बाएं और हमारे आवास तक
जाने वाली गली के ठीक दाहिनी ओर एक चश्मे की दूकान है,जिस तक जाने के लिए चार या पांच स्तरों वाली सीढ़ी बनी है।रात को 10 बजे के बाद जब दूकान बन्द हो जाती है,तब हम अक्सर उन्हीं
सीढ़ियों पर चाय की चुस्कियों के साथ तमाम तात्कालिक मुद्दों पर बहस का क्षेत्रीय
कार्यक्रम संचालित करते।आशुतोष,अमनदीप,पुनीत,अमन,समर,गौरव और अंकित भैया!ये सभी लोग दिल्ली की इस सबसे छोटी संसद का हिस्सा
होते।बड़ी से बड़ी राजनैतिक सत्ता यहां की दलीलों से पल भर में धड़ाम हो जाती।बड़े से
बड़े,जटिल से जटिल मुद्दे जो सदियों से समाधान की राह तक रहे हैं,उन्हें घण्टा भी नहीं लगता कि उसका सर्वमान्य समाधान हाज़िर हो जाता।हर रोज़ तो
नहीं,लेकिन प्रायः ये दृश्य यहां दुहराए ही जाते रहे।
शोरगुल,बहस,चहल-पहल ये सभी इस चौराहे के परिचय का आधार-स्तम्भ हैं।दिन भर हज़ारों पदचापों
से गूंजने वाली ये सड़क हर रात को थककर गहरी नींद में सो जाना चाहती है।जब मैं अपने
दिन भर की उदासी को नींद के सागर में नहीं डुबो पाता,तब मैं एक किनारे की तरह समझकर इन्ही सीढ़ियों पर आकर बैठ जाता
हूँ।विचारों-यादों और तमाम घटनाओं की स्मृतियां मन के मैदान में दंगल करतीं।कभी
समाधान मिलता तो कभी कुछ निष्कर्ष निकलने की बजाय मैं आशंका और उदासी के दलदल में
और गहरा धँसा जाता।लेकिन फिर भी,इन सीढ़ियों के आसपास
कायम सन्नाटे और शांति की गहरी छाँव में बैठकर मैं बहुत थोड़ा सा ही सही,लेकिन शांति और सुकून तो अवश्य पा लेता।
बेर सराय ठहरता नहीं था कभी। हां, जब जो चाहे आराम तो फरमा
सकता था लेकिन बेर सराय कभी किसी को रोकता नहीं था। आधी रात को बस एक मेसेज के
बुलावे पर घर बदलते रहते थे। कभी अनुराग भाई के घर तो कभी समर के घर। अनुराग भाई
के घर तो कई बार महफिलें कवि सम्मेलनों में तब्दील हुई हैं। समर के यहां भी ऐसा ही
कुछ था। इस तरह का आकाश पहली बार नसीब हुआ था। इन जगहों पर एक एक पल विछोह की
अटलता को रौंदते हुए बीता है। इसलिए हर एक पल के साथ इतना जुड़ाव हो गया है कि अब
उससे अलग नहीं हुआ जा सकता। मेरी एक कमजोरी है। जब मैं भावुक होता हूं तो शब्द और
वाक्य मेरी भावनाओं में डूबने उतराने लगते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि मेरे
कहन की सीमा कम हो जाती है। इस संग्रह के लिखने के आज के कोटे में इसालिए मैं
ज्यादा शब्द नहीं भर पा रहा हूं क्योंकि भावनाएं आज उफान पर हैं। बाकी जिन चीजों
को यहां लिख दिया है वो जीवन के किसी भी मोड़ पर जब पढ़ी जाएंगी, सारी यादें हरा
कर देंगी।
अतीत के आइने में
दोपहर में जीतू की दूकान पर चाय पीते हुए अचानक एक दिन
आशुतोष ने मुझसे कहा,'शुक्ला जी!आप जब शुरू-शुरू में आये थे तो बहुत हंसते थे।' ये सवाल-जवाब जो भी था,था तो बड़ा सीधा सा,सामान्य सा।लेकिन मेरे लिए मेरे मानस पर गहरे प्रश्नचिन्ह छोड़ जाने वाला था। 'थे'
इस पूरे वाक्य का ऐसा शब्द था,जिसने मेरी पूरी चेतना को 7 महीने पीछे ले जाकर
अपना खुद का चेहरा देखने पर मजबूर कर दिया। सच में!मैं बहुत हंसता था।मैं हंसता था,क्योंकि मुझे यहां अच्छा लगता था। मुझे नये दोस्त मिले,अच्छे दोस्त मिले,नया जीवन अनुभव मिला,नयी जिम्मेदारियां मिलीं,नये अवसर मिले,बेहतर भविष्य की बेहतर संभावनाएं मिलीं।कुल मिलाकर मेरे पास न हंसने का कोई
प्रभावी कारण नहीं था।दुखी होने की जो भी वजह थी,मैं उसे स्वर्णिम भविष्य की संभावनाओं की ओर बढ़ने वाले क़दमों तले रौंद देता
था।मैं खुश था।
आईआईएमसी मेरा कोई सपना नहीं था।यहां आने के लिए मैंने कोई
जीतोड़ मेहनत भी नहीं की थी।पिताजी के आदेश-विरुद्ध लखनऊ पहुंचकर पत्रकारिता की
दुनिया में दाखिल होने की पहली प्रक्रिया पूरी करने के लिए मैंने कोई ख़ास तैयारी
नहीं की थी। शायद नियति मेरे लिए चुनौतियों के पत्थरों से नए रास्ते के निर्माण
में लगा हुआ था। परिणाम आये,चयन भी हुआ,और पत्रकारिता के एक सबसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश भी मिला। हाँ,आईआईएमसी आना भले मेरे सपनों का कभी हिस्सा न रहा हो,लेकिन दिल्ली में मैं अपनी अभिलाषाओं और उद्देश्यों के समाधान अवश्य देखता
था।सो दिल्ली आने की बड़ी खुशी थी।delhities के तौर पर शुरूआती दौर में अनुराग भाई,अभिषेक,दयासागर,नीलेश,विवेक सिंह जैसे दोस्त खुशनुमा पलों के साझीदार थे। बढ़ते वक़्त के साथ मेरी
ज़िन्दगी के कोष में और भी लोग जुड़े।मेरे आत्मीय जनों की सूची में रोहिन आया,समर आया,शताक्षी आयी,विवेक,अमनदीप,अमन आए,
रीतिका आयी।और फिर लगा इतने कीमती लोगों को देने वाली
दिल्ली मुझसे न जाने कौन से जन्म के अहसान उतार रही है। सच में बहुत कुछ पा लिया
था। इतने अच्छे दोस्त शायद आज तक मेरी ज़िंदगी में नहीं ही आये थे। ये दिल्ली का
शुरूआती दौर था,जो मुझे मोह के उस पाश में बांधता चला गया,जिसके बाद मुझे अपने घर
की याद भी धूमिल होती चली गयी।
निराशाओं का दौर भी
दिल्ली ने शुरूआती दिनों में मुझे जितने ख़ुशी के क्षण दिए
थे, ऐसा लगता है कि गुज़रते समय के साथ उसने एक एक करके वो सब मुझसे छीन लिया। नवम्बर
से पहले और नवम्बर के बाद,मेरे दिल्ली-जीवन का इतिहास इन दो धड़ों में बंट गया। नवम्बर के पहले सब कुछ
शानदार था,सकारात्मकता थी,हंसी थी,ख़ुशी थी,नयी-नयी चीज़ें ज़िन्दगी से जुड़ रहीं थीं। दिल्ली बहुत कुछ बिना मांगे दिए जा
रही थी। मैं भी सोचता,बस यही तो ज़िन्दगी है। लेकिन नवम्बर बाद सब कुछ बदलने लगा। जैसे किसी ने मेरी
नियति की मशीन में कुछ छेड़छाड़ कर दी हो। अधरों से हंसी गायब,आँखों से ख़ुशी गायब,चेहरे पर रौनक नहीं,पूरे व्यक्तित्व पर एक अंजान उदासी ने अपना डेरा जमा लिया।लोग छूटते गये।ऐसा
लग रहा था जैसे दिल्ली को हमने किसी बात पर नाराज़ कर दिया हो,और उसने धीरे-धीरे अपनी दी हुयी सारी चीज़ें वापस लेनी शुरू कर दीं हों।
एक हंसता हुआ व्यक्तित्व,जिसकी वजह से मैं बड़ा आश्वस्त रहता था कि डिप्रेशन जैसी चीजों से मेरा कभी
सामना नहीं हो सकता,चाहे कितनी भी बड़ी विपदा क्यों न हो।लेकिन आश्वासन को भूशायी होने में समय
कहाँ लगता है।असली विपदाओं से तो अभी पाला भी नहीं पड़ा था।दिल्ली के सर्द मौसम ने
होंठों की चंचलता को फ्रीज़ कर दिया था।मुझे सब लोग मुझसे ऊबते हुए से महसूस होने
लगे।मुझे मेरी योग्यता पर,मेरी क्षमता पर और मेरी किसी भी काम में आवश्यकता पर संदेह होने लगा।बातों
बातों में किसी से भी अपनी योग्यता पर उठते प्रश्नचिन्ह मुझे तीर की तरह चुभने
लगे। मुझे खुद के विषय में सोचने को मजबूर होना पड़ गया,कि मैं ऐसे कौन से काम के लिए बना हूँ,जो मैं अब तक शुरू नहीं
कर सका। निराशा के इस दौर में आंसुओं को रोपने के लिए एक कंधे की ज़रूरत थी। मैं सबके
सामने खुलने का आदी नहीं हूँ इसलिए बहुत दिनों तक घुटन और मानसिक तनाव की चपेट में
आकर अपना स्थायित्व खोता रहा। नज़रों का ठहराव,मन की उदासी और पांवों
की चपलता,ये लक्षण काफी थे मेरे frustration का शोर मचाने के लिए। अब
जिससे भी मिलें,उसका एक ही सवाल होता कि 'क्या हुआ तुमको!ऐसे सड़ा
हुआ मुंह क्यों बनाये हुए हो!'और मेरे पास कोई जवाब
नहीं होता था।मैं सबसे 'पता नहीं'
कहकर पीछा छुड़ा लेता।लेकिन मैं उस frustration से कभी पीछा नहीं छुड़ा पाया,जो आज भी मेरे स्वच्छन्द
आकाश में उड़ने की अभिलाषाओं के पंखों को जकड़े हुए है,और जिसके लिए मुझे डर है कि कहीं ये निराशा उन पंखों को नोचकर उड़ान की
संभावनाओं की हत्या न कर दे।
चलते रहे जिंदगी के पहिए
कई कारणों ने जिंदगी के माहौल को तनावपूर्ण बना रखा था। इन
सबके बीच जिंदगी के पहिए हिलते-डुलते रहे। दिसंबर आया, परीक्षाएं हुईं। उसके बाद
एक लंबा अवकाश,जिसने एक बार फिर उदास माहौल को सुन्न कर दिया। चौतरफा खालीपन। आज
के समय में जिस परिस्थिति से हम गुजर रहे हैं उसकी एक झलक उसी समय मिल गई थी जब
सभी परीक्षाएं देकर अपने-अपने घर लौट गए थे। हम रुके हुए थे। क्योंकि हमने एक
जिम्मेदारी ली हुई थी। एक डॉक्यूमेंट्री बनाना था हमें। विवेक की योजना थी कि इस
छुट्टी का सदुपयोग करना है। ऐसा हो कि जब हम यहां से जाएं तो हमारे पास कुछ हो।
इसलिए कैमरा इश्यू करवाया गया। विषय चुना गया। ट्रैफिक पुलिस द्वारा ऑन ड्यूटी आने
वाली चुनौतियों को हमें रिकॉर्ड करना था, उनका एक दस्तावेज तैयार करना था। विवेक,
शताक्षी, रीतिका, रोहिन और हम, ये पांच लोगों की टीम थी। सुल्तान भाई का स्पेशल
अपीयरेंस था। इसके अलावा बीच में सम्यक भी हमारी टीम का हिस्सा बना।
हमने दिल्ली के अलग-अलग जगहों के ट्रैफिक सिग्नल्स पर
शूटिंग की। ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ ट्रैफिक पोलिस का इंटरव्यू लिया। कई ट्रैफिक
पुलिसकर्मियों की बाइट ली। एक केस स्टडी थी,तो उनके घर जाकर उनके माता-पिता और
पत्नी का भी इंटरव्यू टाइप बाइट लिया। इसके अलावा राजपथ, धौला कुआं, सीलमपुर,
आईटीओ, छतरपुर आदि कई जगहों पर जाकर ट्रैफिक शूट किया। कई दफा टोडापुर से आईटीओ के
चक्कर लगाए। अधिकांश कामों में विवेक शताक्षी और हम साथ थे। इतनी मेहनत के बाद भी
अभी तक डॉक्यूमेंट्री को फाइनल टच नहीं दिया जा सका है। लेकिन उस दौर के अनुभवों
से बहुत कुछ सीखने को मिला। खाली हाथ तो हम अब भी नहीं हैं।
छुट्टियां बीतीं। सब लोग वापस आए। कक्षाएं शुरु हुईं। इस
सेमेस्टर में कुछ खास नहीं था। कक्षाएं भी बहुत नीरस थीं। लैब जर्नल बनाने वाले
दिन थोड़ा बहुत अच्छा लगता था। एक अजीब सा बिखराव आ गया था क्लास में भी। अलग-अलग
ग्रुप बन गए थे। सभी अपने ग्रुपों में मशगूल थे।




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